Abdominal ( पेट ), Kidney ( किडनी ), Chest ( छाती )& Liver ( जिगर ) के रोग :-
1. गौस्ट्रिक अल्सर (Gastric ulcer) :-
गौस्ट्रिक अल्सर (Gastric ulcer) यानि पेट की भीतरी परत पर होने वाले घाव को मौस्ट्रिक अल्सर यानी पेट के घाव कहते हैं।
कारण:
ज्यादतर अल्सर का कारण एच पायलोरी बैक्टिरियल इन्फेक्शन होता है। दर्द दवाइयों के सेवन और मानसिक तनाव से भी पेट में घाव का खतरा बढ़ जाता है। वहीं शराब के लत, बाहर का तला खाना व धूम्रपान से भी ये स्थिति हो सकती है।
लक्षण:
अल्सर के कारण पेट में दर्द, कच्चा मन होना, खट्टी डकार आना, उल्टी होना, सीने में जलन होना, गहरा मल आना आदि लक्षण आते हैं
सावधानी :
यदि शराब व धूम्रपान पर काबू करे तो कुछ हद तक असर ठीक हो सकते हैं मिर्च मसाले व तेल का सेवन कम करे।
आयुर्वेदिक उपचार :
परहेज के साथ साथ उपचार जैसे सूत शेखर रस, कामदुधा रस, शखं भस्म, अविपत्तिकर चूर्ण लेने से अल्सर से राहत मलती है।
2. Duodenal Ulcer:-
ड्यूडेनल अल्सर (Duodenal ulcer) यानि छोटी आंत के ऊपरी भाग में घाव हो जाना। कारण- एच पायलॉरी बैक्टिरियल इन्फेक्शन, दर्द निवारक दवाइयों का ज्यादा प्रयोग ।
लक्षण:
इन अल्सर के कारण भूख न लगना, पेट में दर्द, मल में खून आना, सांस लेने में तकलीफ होना, बेहोशी छाना, वजन घटना, पेट फूलना आदि।
आयुर्वेदिक चिकित्सा:
- महाशंख वटी
- प्रवाल पिष्टी
- सूतशेखर रस
- महातिक्त घृत।
सावधानी- मिर्च मसाले व तला भोजन न करे, अधिक तेल प्रयोग न करे, केमिकल युक्त दवाइयों का कम प्रयोग आदि।
3. IBJ, Acidity:-
जब पेट मे ऐसिड अथवा तेजाब अधिक बनने लगता है, उसे ऐसिडिटी कहते हैं।
कारण:
अधिक मिर्च- मसालों से बना हुआ भोजन करना,नॉन वेजिटेरियन भोजन का अधिक प्रयोग, धूम्रपान करना एवं शराब का अधिक सेवन करना, मानसिक तनाव लेना, अत्यधिक दर्द निवारक दवाईयों का प्रयोग,अधिक उर्वरकों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन।
लक्षण -
सीने में जलन जो भोजन करने के बाद अधिक होती है, खट्टी डकारों का आना,मुँह का स्वाद कड़वा होना,पेट फूलना,मिचलाहट होना एवं उल्टी आना,गले में घरघराहट होना,साँस लेते समय दुर्गन्ध आना,सिर और पेट में दर्द।
घरेलू उपचार-
- ठंडे दूध में एक मिश्री मिलाकर पीने से राहत मिलती है।
- एक चम्मच जीरे और अजवायन को भूनकर पानी में उबाल लें और इसे ठण्डा कर के चीनी मिलाकर पिए।
- खाना खाने के बाद सौंफ चबाएं।
- कच्चा नारियल और उसका पानी, खीरे आदि सेवन करें।
- भोजन में हल्के आहार जैसे दलिया, खिचड़ी खाएं।
- मानसिक तनाव दूर करने के लिए अपनी रुचि के अनुसार संगीत सुनना अथवा योगाभ्यास जैसी क्रियाएँ कर सकते हैं।
आयुर्वेदिक उपचार-
- अविपत्तिकर चूर्ण
- सुतशेखर रस
- कामदुधा रस
- मौक्तिक कामदुधा
- अमलपित्तान्तक रस
- अग्नितुण्डि वटी
- फलत्रिकादी क्वाथ
4. Gas:-
इसे पेट या आंतों की गैस और पेट फूलना के रूप में भी परिभाषित किया जाता है, यह एक अपशिष्ट गैस होती है जो पाचन के दौरान बनती है। यह गैस आम तौर पर गुदा (anus) से होते हुऐ कई बार गंध और आवाज के साथ बाहर निकलती है।
पेट में अत्यधिक गैस होने के लक्षणों में निम्न शामिल हैं:
- गैस निकलने में वृद्धि या बार-बार गैस आना-
- बदबूदार गैस बनना
- बार-बार डकार आन
- पेट फूलना (या सूजन) (और पढ़ें- पेट फूलने की समस्या से अगर छुटकारा चाहते हैं तो जरूर करें ये उपाय)
- पेट में दर्द और बेचैनी
गैस का कारण बनने वाले खाद्य पदार्थ:
- राजमा और मसूर
- कार्बोनेटेड पेय पदार्थ, जैसे सोडा व बीयर
- लैक्टोज युक्त डेयरी उत्पाद।
- सोर्बिटोल (कुछ चीनी मुक्त कैंडी और चुइंगम आदि में पाया जाने वाला मीठा पदार्थ)
पेट में गैस से बचाव:
राजमा, मटर, मसूर, बंदगोभी, फूलगोभी, प्याज, ब्रोकोली, मशरूम और साबुत अनाज हैं। इसके अलावा कुछ प्रकार के फल, बीयर और अन्य कार्बोनेटेड पेय पदार्थ भी पेट में गैस उत्पन्न करने का काम करते हैं। अगर गैस में वृद्धि होती जा रही है, तो कुछ समय के लिए इन चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए।
- कम वसायुक्त भोजन खाएं
- अस्थायी रूप से उच्च फाइबर खाद्य पदार्थों में कमी
- धीरे-धीरे खाएं और पीएं
- कार्बोनेटेड ड्रिंक्स व बीयर का सेवन ना करें कार्बोनेटेड पेय और बीयर शरीर में कार्बनडाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करती है।
- कठोर कैंडी व चुइंगम आदि को छोड़े चुइंगम चबाते समय या किसी कटोर कैंडी को चूसते समय आप सामान्य से – कहीं ज्यादा हवा को निगल लेते हैं।
- धूम्रपान ना करें धूम्रपान करते समय जब आप धुंआ अंदर लेते हैं उसके साथ अत्यधिक मात्रा हवा भी निगल लेते हैं।
- भोजन करने के बाद थोड़ा पैदल चलें खाना खाने के बाद थोड़ा बहुत चलने से भी गैस उत्पादन में कमी आती है।
आयुर्वेदिक उपचार:
आयुर्वेद में पेट में गैस के लिए बहुत सारी दवाइयां उपलब्ध है जैसे हिंग्वाष्टक चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, शिव चार पाचन चूर्ण, शिवाक्षर पाचन चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, अभयारिष्ट, त्रिफला चूर्ण, हरीतकी चूर्ण आदि
5. पेट का कैंसर (stomach cancer):-
पेट का कैंसर, जिसे गैस्ट्रिक कैंसर भी कहते हैं, पेट की सबसे भीतरी परत में म्यूकस-उत्पादक कोशिकाओं में शुरू होता है। यह फिर बढ़ता है और फैलता है। यह पहले पेट की दीवार में फैलता है और फिर बढ़ कर आस पास के उत्तकों में फैल जाता है। बाद में ये जिगर (यकृत), फेफ़ड़े और पेरिटोनियम में फैल जाता है।
कारण:
एच पाइलोरी (H. pylori) नामक एक जीवाणु से संक्रमण,पेट में लगातार सूजन,पेट में कुछ प्रकार के पॉलिप्स,धूम्रपान,मोटापा,स्मोक्ड, अचारित या नमकीन खाद्य पदार्थों से युक्त आहार
लक्षण -
अपच, पेट में जलन और पेट फूलना,लगातार कमजोरी या थकान महसूस करना,भूख न लगना,वजन कम होना,हीमोग्लोबिन में कमी ,पेट में दर्द या बेचैनी,मल में लाल खून का धब्बा या काले रंग का मल,थोड़ी मात्रा में भोजन करने के बाद पेट भरा हुआ महसूस होना,मतली और उल्टी (रक्त के साथ या इसके बिना)
कैंसर का प्रसार -
स्टेजिंग से बीमारी के प्रसार का पता चलता है।यह पता लगाने के लिए परीक्षण करते हैं कि ट्यूमर कितना फैल गया है। इसके लिए निम्नलिखित जांच करवानी चाहिए -CT स्कैन,PET स्कैन, एंडोस्कोपी।
उपचार -
पेट के कैंसर का उपचार ट्यूमर के चरण पर निर्भर करता है। शुरुआत के चरणों के पेट के कैंसर का प्राथमिक उपचार सर्जरी है।
बढे हुए कैंसर (स्थानीय प्रसार), कीमोथेरेपी और/या रेडियोथेरेपी और सर्जरी को संयोजित किया जाता है जिसे मल्टीमॉडल उपचार कहते हैं।
6. ANOREXIA:-
एनोरेक्सिया’ (Anorexia) को भूख की कमी (Lack of Appetite) के रूप में देखा जाता है। यह एक अस्थायी समस्या है. इसमें लोगों को भूख बहुत कम लगती है। इस विकार से पीड़ित व्यक्ति में भोजन के प्रति अरुचि विकसित हो जाती हैं।
कारण:
अनेक कारणों से हो सकती है जैसे मोटे होने का डर, पेट खराब होना, मानसिक तनाव और कोई लंबी बीमारी से ग्रस्त होने के कारण
लक्षण:
पतला और कुपोषित दिखना, अत्यधिक वजन घटाना, अनिद्रा, थकान, चक्कर आना, बेहोशी के दौरे, छिलकेदार त्वचा, पेट में दर्द, कब्ज
उपचार:
- जीवनशैली में बदलाव और कुछ घरेलू औषधियों की मदद से एनोरेक्सिया का उपचार किया जा सकता है क्योंकि यह एक अस्थाई समस्या है।
- नोरेक्सिया के लिए जीवन शली में परिवर्तन मानसिक तनाव (Mental Stress) को दूर करने के लिए आपम्यूजिक सुन सकते हैं या वह काम करें जिसमें आपको खुशी मिलती है।
- भोजन करने के लिए एक साथ ढेर सारा भोजन लेकर ना बैठें, बल्कि थोड़ा-थोड़ा करके दिन में कम से कम 5 बार खाएं।
- रोजाना नियमित रूप से योग करें।
- रोजाना नियमित रूप से मेडिटेशन (Meditation) करें।
आयुर्वेदिक उपचार:
आयुर्वेद में भूख बढ़ाने के लिए हिंग्वाष्टक चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, शिव क्षार पाचन चूर्ण, अभयारिष्ट, शंख वटी, महाशंख वटी, गैस हर वटी, सौंफ अर्क, अजवाइन अर्क, मकोय अर्क, कासनी अर्क जैसी अनेकों औषधियां उपलब्ध है! हींग का प्रयोग करे, जो भूख बढ़ाने और पाचन में सुधार करने के लिए जाना जाता है। यह पेट की ऐंठन में भी राहत दिलाता है।
7. कब्ज (CONSTIPATION):-
आम तौर पर एक सप्ताह में तीन से कम बार मल त्याग करने को कब्ज होना कहा जाता है। कब्ज एक सामान्य समस्या है जो सभी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि आप नियमित रूप से मल पास नहीं कर पा रहे हैं या पूरी तरह से आपका पेट साफ नहीं हो रहा है।
कब्ज के लक्षण:
- कब्ज होने के संकेत व लक्षण इस प्रकार होते हैं.
- कब्ज में मल सख्त हो जाता है जिसकी वजह से मलत्याग में अधिक जोर लगाना पड़ता है।
- कब्ज से पीड़ित लोग प्रतिदिन मलत्याग के लिए नहीं जाते हैं जिससे इनकी परेशानी बढ़ जाती है और मलत्याग में अधिक मुश्किल होती है।
- ऐसे लोगों की जीभ सफेद या मटमैली हो जाती है और मुंह का स्वाद भी खराब हो जाता है। साथ ही मुंह से बदबू भी आने लगती है। (और पढ़ें- मुंह का स्वाद खराब होने के कारण)
- कब्ज के रोगियों को भूख नहीं लगती है, साथ ही मतली और उलटी की स्थिति बनी रहती है। बाथरूम जाने के बाद अधूरे मल त्याग की भावना, पेट में सूजन या पेट दर्द आदि भी कब्ज के लक्षणों में आते हैं।
कब्ज के सामान्य कारण में निम्न शामिल हैं:
- कम फाइबर वाला आहार, विशेष रूप से ज्यादा मांस, दूध, या पनीर वाला आहार
- निर्जलीकरण
- व्यायाम की कमी
- मलत्याग करने में बार-बार देरी करना
- सफर करना या दिनचर्या में अन्य परिवर्तन
- कुछ दवाएं, जैसे ज्यादा कैल्शियम वाले एंटासिड और दर्द निवारक दवाएं
- गर्भावस्था
- कुछ अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्याएं भी कब्ज का कारण बनती हैं जैसे कि- कुछ बीमारियां, जैसे स्ट्रोक, पार्किंसंस रोग और डायबिटीज
- आंतों की रुकावट, आईबीएस, या डायवर्टीकुलोसिस सहित बृहदान्त्र या मलाशय की समस्याएं
- जुलाब का ज्यादा प्रयोग या दुरुपयोग
- हार्मोनल समस्याएं, जैसे थायरॉयड ग्रंथि का कम काम करना (जिसकी वजह से हाइपोथायरायडिज्म होता है)
कब्ज के सामान्य कारण में निम्न शामिल हैं:
- फाइबर युक्त भरपूर भोजन करें। अच्छे स्रोत हैं फल, सब्जियाँ, फलियाँ, और साबुत अनाज।
- पानी और अन्य तरल पदार्थों का खूब सेवन करें। फाइबर और पानी मलत्याग को नियमित रखने के लिए एक साथ काम करते हैं।
- कैफीन से बचें। चाय और कॉफी निर्जलीकरण कर सकते हैं।
- दूध पीना कम कर दें। डेयरी उत्पाद से कुछ लोगों को कब्ज हो सकती है।
- नियमित रूप से व्यायाम करें। हर दिन कम से कम 30 मिनट सक्रिय रहें।
- जब प्रेशर बने, तो लेट्रिन जरुर जाएं, उसे रोके नहीं ।
8. अपकालीन किडनी की विफलता (Acute Renal failure) :-
अल्पकालीन किडनी की विफलता वह है जो कुछ घंटों या कुछ दिनों में उत्पन्न हुई हो। यह एक ऐसी बीमारी हैं जो शरीर में पहले से मौजूद अन्य बीमारियों के साथ जैसे दिल की बीमारी , यकृत विफलता आदि के साथ उत्पन्न हो जाती है। इस बीमारी में किडनी अचानक से शरीर के तरल , लवण न अपशिष्ट पदार्थों को छानकर शरीर से बाहर निकालने की क्षमता को खो देती है।
कारण:
शरीर में ऐसी स्थिति दे जाना जिसके कारण किडनी में रक्त की आपूर्ति नहीं हो पाती। किडनी से मूत्राशय तक मूत्र ले जाने वाली मूत्रवाहिनियों में रुकावट से अपशिष्ट पदार्थों का बाहर न निकाला जाना। गंभीर मा आसानी पानी की कमी हो जाना आदि इसके कारण हैं। आंतों के संक्रमण के कारण गंभीर उल्टी व दस्त लगाना। रक्त प्रभाव में गंभीर संक्रमण हो जाना आदि।
लक्षण:
उच्च रक्तचाप, शरीर में साजिश आ जाना सांस आने में परेशानी न थकान महसूस होना, मूत्र मात्रा में कमी आना। एमू ख कम लगना जी मिलना, व उल्टी आना आदि।
उपचार :
अल्पकालीन किडनी की विफलता के इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण एभूमिका हैं कि कारण जानकर उसका इलाज करना।
आयुर्वेदिक उपचार:
गोक्षुरादि गुलगुले, पुनर्नवा अरिष्ट, वरुणादि कषाय, चन्दनादि वटी, वरुणादि वटी।
9. CKD:-
परिभाषा क्रोनिक किडनी रोग (CKD) एक ऐसी स्थिति है जिसमे किडनी धीरे धीरे काम करना बंद कर देती है। जब यह बीमारी बढ़ती है, तो शरीर में तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट और अपशिष्ट पदार्थ बढ़ जाते हैं। जिससे उच्च रक्तचाप, खून की कमी, कमजोर हड्डियां, खराब पोषण, तंत्रिका क्षति हो सकती है।
कारण:
मधुमेह रोग, अत्यधिक रक्तदाब, गुर्दे की धमनी का सिकुड़ जाना व भ्रूण विकास संबंधी समस्या ।
लक्षण :
आंखों के आस पास सूजन, अपर्याप्त भूख, नींद न आना, बार बार पेशाब आना, सूजे पैर व टखने, सूखी खुजली वाली त्वचा आदि।
उपचार:
पुरानी गुर्दे की बीमारी का वास्तव में कोई ईलाज नही है। वही दूसरी ओर कुछ दवाइयों का प्रयोग संकेतों और लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकती हैं।
आयुर्वेदिक उपचार:
क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों में आयुर्वेद में अन्य किसी चिकित्सा पद्धति के अलावा बहुत अच्छे रिजल्ट है आयुर्वेद में सीकेडी के मरीजों को ठीक करने के लिए बहुत अच्छी-अच्छी ओसधियाँ उपलब्ध है जैसे पुनर्नवा मंडूर, गोक्षुर आदि गुगगुल, वरुणादि क्वाथ, वरुणदि वटी, भूम्यमलकी वटी आदि गुर्दे की बीमारी में लाभकारी हैं।
10. गुर्दे की पथरी:-
गुर्दे की पथरी एक क्रिस्टलीय पदार्थ है जो गुर्दे या मूत्र पथ में कहीं भी हो सकती है। एक छोटा पत्थर लक्षण के मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है।
गुर्दे की पत्थरी के लक्षण है:
- पेट और पीठ के एक हिस्से में तेज दर्द महसूस होना
- उतरता दर्द जो पेट के निचले हिस्से सौर कमर के क्षेत्र में जाता है
- पेशाब करते समय जलन महसूस होना
- पेशाब के रंग में बदलाव
- अत्यधिक दुर्गंधयुक्त पेशाब
- व्लॉउडी मूत्र ( Cloudy urine)
- बार-बार पेशाब करने की इच्छा होना
- मतली और उल्टी
- बुखार और ठंड लगना
घरेलू उपाय:
- सोडियम कि अधिक मात्रा न लें। जंक फूड, डिब्बा बंद खाना और नमक के बहुत अधिक सेवन से बचें।
- पालिक, साबुत अनाज आदि में आग्स्लेट पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसका सेवन ना करें।
- टमाटर के बीज, बैंगन के बीज, कच्चा चावल, उडद और चने का अधिक सेवन करने सं स्थान की समस्या बढ़ जाती है। अधिक से अधिक पानी पिएं और कोल्ड ड्रिंक का सेवन न करें, इसमें मौजूद फॉस्फेटिकर एसिड स्टोन के खतरे को और बढ़ता हैं।
- शरीर में यूरिक एसिड को बढ़ने न दें इसलिए मांसाहार का सेवन बिल्कुल किन करें।
आयुर्वेदिक उपचार :
आयुर्वेद में गुर्दे की पथरी के इलाज के लिए बहुत ही प्रभावशाली औसधियाँ उपलब्ध हैं जैसे चंद्रप्रभा वटी, गोक्ष् रादि गुग्गुल, श्वेत पर्पटी, कुलथी की दाल, त्रिविक्रम रस आदि गुर्दे की पथरी
गुर्दे की पथरी एक क्रिस्टलीय पदार्थ है जो गुर्दे या मूत्र पथ में कहीं भी हो सकती है। एक छोटा पत्थर लक्षण के मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है।
11. Cystitis (मूत्राशय की सूजन) :-
मूत्राशय की सूजन को सिस्टिटिस किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
कारण :
मूत्र पर्थ के संक्रमण ( UT I ), कैसेटर का निरंतर उपयोग, विकिकरण के लिए एक्सपोजर, परेशान करने वाले स्वच्छता उत्पाद, कुछ दवाएं लेना।
लक्षण :
दर्द, पेशाब में जलन या चुभन, अधिक बार पेशाब करना, गहरा और मैला पेशाब, यूरिन पास करने की तत्काल आवश्यकता, पेट के निचले हिस्से में दर्द होना, सामान्य दर्द, कमजोरी, और थकान, बुखार।
उपचार :
- ढेर सारा पानी और अन्य स्वस्थ पेय पदार्थ पिएं।
- नियमित अंतराल पर पेशाब करें।
- मल त्याग पर आगे से पीछे की ओर पोंछे।
- योनि मार्ग को स्वच्छ रखें।
आयुर्वेदिक उपचार :
गोक्षुर चूर्ण, पुनर्नवा अरिष्ट, गिलोय सत्व।
12. URETHEREAL STRUCTURE ( युरेथरल स्ट्रिक्चर ):-
यह एक स्थिति हैं जहां किसी व्यक्ति के मूत्रमार्ग का लुमेन संकीर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मूत्र प्रवाह प्रतिबंधित होता है। यह ज्यादातर पुरुषों को प्रभावित करता है
कारण :
मूत्रमार्ग में होने वाली किसी भ्भी तरह की सूजन के कारण, ट्यूमर, आधार, संक्रमण, मूत्रमार्ग इंस्ट्रूमेंटेशन, जटिल सर्जरी, प्रोस्टेट का बढ़ जाना, मूत्राशय का कैंसर।
लक्षण :
मूत्र के प्रवाह में बाधा, पेशाब की एक दर्दनाक असहज प्रक्रिया जिसे डिसुरिया भी कहा जाता है, मूत्र पथ में यूटीआई या संक्रमण, मूत्र रि टेंशन, मूत्राशय को खाली करने की एक अधूरी प्रक्रिया, पेशाब की दोहरी स्ट्रीमिंग
आयुर्वेदिक उपचार :
आयुर्वेद में चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुल, श्वेत पर्पटी जैसी अत्यंत प्रभावशाली औसधियया उपलब्ध है जो कि यू रियल पिक्चर के मरीजों को एकदम से आराम पहुंचाती है
क्रेननारीः
पोषक तत्वों पीएसी से समृद्ध, यह बैक्टीरिया के संक्रमण को रोकने में मदद कर्क हैं जो कूटा पथ को प्रभावित कर सकता है।
13. यूटी आई क्या होता है (UTI)? :-
यू. टी. आई तब होता हैं जब मूत्राशय और उसकी नली बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाती है। ई-कोलाई बैक्टिरिया का संक्रमण इसका मूल कारण होता हैं। इस समस्या के कुछ कारण हैं जैसे, लम्बे समय तक पेशाब, रोके रखना, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति और शुगर। मूत्र पथ के संक्रम्रण, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक आम हैं। आधी महिलाओं को उनके जीवन में कम से कम एक बार संक्रमण होता हैं।
यूटीआई क्यों होता हैं?(Cause of UTI) :
वैसे तो यूटीआई का संक्रमण ई-कोलाई बैक्टीरिया के कारण होता है, लेकिन इसके अलावा और भी लक्ष्ण होते हैं जो इस बीमारी के होने की वजहें होते हैं- विशेषकर यदि संभोग अधिक बार, तीव्र और कई या बहुत लोगों के साथ किया जाये तो यू. टी. आई हो सकता हैं, शुगर के रोगियों को यू. टी. आई होने की खतरा अधिक होता है, अस्वच्छ रहने की आदत, मूत्राशय को पूरी तरह से खाली न करना, दस्त आना, मूत्र करने में बाधा उत्पन्न होने पर, पथरी होने के कारण, गर्भनिरोधक का अत्यधिक उपयोग करने से, रजोनिवृत्ति काल में, कमजोर प्रतिरोधक प्रणाली होते से, एंटीबायोटिक द्वारों का अधिक उपयोग करने से।
यूटीआई लेने के लक्ष्ण ( Symptoms of UTI) :
वैसे तो यूटीआई की समस्या होने से सबसे पहले मूत्र संबंधी समस्याएं होती है, लेकिन इसके अलावा और भी लक्षण होते हैं। मूत्राशय में संक्रमण होने पर मूत्र मार्ग भोर मूत्राशय की परत में सूजन आ जाना, पेशाब त्याग करते समय दर्द यो जलन महसूस होना, बार-बार पेशाब करने के लिए उठना और बहुत कम मात्रा में मूत्र त्याग होना, एकदिन पेशशान हो जाने का डर लगना, पेशाब से बदबू आना, पेशाब से खून आना, पेट के निचले हिस्से में दर्द होता, हल्की बुखार माना, ठण्ड लगना या कभी-कभी ठण्ड के साथ कंपकंपी लगता, जी मिचलाना।
मूत्र मार्ग में संक्रमण के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां:
गोक्षुर में ऊर्जादायक, दर्द निवारक, नसों को राहत देते ताले और कामोत्तेजक (लिबिडो बढाने वाला) गुण मौजूद हैं। पुनर्नवा में मूत्रवर्द्धन गुण मौजूद होते हैं जो कि यूटीआई के मामले में संक्रमित बैक्टीरिया को शरीर से बाहर निकालने में लाभकारी हैं।
शिलाजीत जडी बूटी वात टॉनिक (शक्तिवर्धक) के रूप में कार्य करती हैं वात के खराब होने के कारण यूटीआई के इलाज में असरकारी है।
आमलकी पेशाब के दौरान होने वाले दर्द और शराब पित्त के कारण यूटीआई के इलाज में आमलकी लाभकारी है क्योंकि इसमें पित्त को साफ करने वाले गुण होते हैं।
मूत्र मार्ग में संक्रमण के लिए आयुर्वेदिक औषधियां:
- चंद्रप्रभा वटी
- प्रवाल भस्म
- शतावरी घृत
- एलादि चूर्ण
- तारकेश्वर इस
- अमृतादि क्वाथ
मूत्र मार्ग में संक्रमण के लिए आयुर्वेदिक औषधियां:
मुद्रा ( मूंगा दाल) और इसका सूप, तक्र (छाछा), दही, यह (जौ), खर्जूर (खजूर), ठंडा पानी, कूष् मांड (लौकी), एलोवेरा की पत्तियां, परवल, आंवला, धृत, दूध और पुराने चावल को अपने आहार में शामिल करें।
14. ब्रोंकाइटिस ( Bronchitis ):-
अनुचित खानपान, जीवन शैली अथवा कमजोर प्रतिरोध क्षमता के कारण संक्रमण की चपेट में आने से ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या हो जाती है। यह श्वासनलीयो में होने वाली सूजन कारी बीमारी है जिसमें तीनों दोष विकृत अवस्था में होकर रोग उत्पन्न करते हैं । आयुर्वेद में ब्रोंकाइटिस को श्वनी शोथ कहा गया है, इसमें मुख्यता पित्त दोष की वृद्धि देखी जाती है तथा वात एवं कफ दोष भी असंतुलित रहता है।
ब्रोंकाइटिस के दो प्रकार का हो सकते हैं:
- तीव्र ब्रोंकाइटिस: या अक्षर सर्दी या किसी श्वसन संक्रमण से विकसित होता है । इस प्रकार के ब्रोंकाइटिस को आमतौर पर छाती की सर्दी के रूप में जाना जाता है, जो आमतौर पर 7 से 10 दिन के भीतर ठीक हो जाता है । जबकि कोई ध्यान देने योग्य स्थाई प्रभाव नहीं है, खासी हफ्तों तक बनी रह सकती है । क्योंकि सर्दी और फ्लू के वायरस संक्रमण होते हैं, इसलिए तीव्रे ब्रोंकाइटिस को भी संक्रमण माना जाता है।
- क्रोनिक ब्रोंकाइटिस: यह ब्रोंकाइटिस का एक अधिक गंभीर प्रकार है जिसमें ब्रोन्कियल वायु मार्ग की सूजन और लगातार जलन होती, जो अक्सर धूम्रपान के कारण होती है । ब्रोंकाइटिस के लक्षण लगभग 3 महीने से 2 साल तक रह सकते हैं और अक्सर चिकित्सा ध्यान देने की आवश्यकता होती है । यह फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी है जिसे अक्सर COPD के रूप में वर्गीकृत किया जाता है ।
लक्षण:
ब्रोंकाइटिस होने पर खासी होने के अलावा और भी लक्षण होते हैं, लेकिन प्रकार के अनुसार इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते है:
एक्यूट ब्रोंकाइटिस होने के लक्षण:
गले में खराश, थकान, नाक बंद रहना, बुखार, शरीर में दर्द, उल्टी।
क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस होने के लक्षण:
खांसी होना और खासते वक्त बलगम बनना, chronic brochitis emphysema के साथ होता है, जो COPD बन जाता है। इसमें रोगी को सांस लेने में कठिनाई और शारीरिक थकावट हो सकती है तथा रोगी को कृत्रिम ऑक्सीजन भी हो सकता है, इसके अलावा खांसी 3 महीने और अधिक समय के लिए रहती है।
ब्रोंकाइटिस के कारण:
सामान्य सर्दी और फ्लू के लिए जिम्मेदार वायरस वही है जो एक्यूट ब्रोंकाइटिस का कारण बनते हैं। लेकिन कभी-कभी यह ब्रोंचाइटिस के कारण भी हो सकता है। दोनों ही मामलों में, ब्रोन्कियल नलिया सूज जाती हैं, जिसे अधिक बलगम पैदा होता है क्योंकि शरीर कीटाणुओं से लड़ता हैं । यह वायु मार के संकुचन की ओर जाता है, जिससे सांस लेने में मुश्किल हो जाता है ।
इसके अलावा ब्रोंकाइटिस के विकास के लिए जिम्मेदार सामान्य कारणों में शामिल है:
- हवा से जहरीली गैसो,
- धूल या रसायनिक धुंए के अंदर लेना,
- लंबे समय तक सक्रिय या निष्क्रिय धूम्रपान।
आयुर्वेदिक इलाज :
ब्रोंकाइटिस के इलाज के लिए आयुर्वेद में त्रिक्टु चूर्ण , सितोपलादि चूर्ण , तालीसदी चूर्ण, सोमलता चूर्ण, टंकण भस्म, सफटिक भस्म, संजीवनी वटी, कनकासव, दशमूलरिष्ट जैसी प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध हैं जो ब्रोंकाइटिस का जड़ से इलाज करती है ।
15. Bronchial Asthama ( दमा):-
यह सांस फूलने की बीमारी है । जब किसी भी व्यक्ति की सास के नलियो में खराबी या उसके फेफड़ों की नालियां पतली हो जाती हैं और उसके कारण सांस लेने में तकलीफ होती है तो यह बीमारी को दमें या अस्थमा की बीमारी कहा जाता है ।
कारण :
- धुए के कारण
- कोहरे के संपर्क से
- तेज तेज चलने के कारण
- धूल व मिट्टी इत्यादि के कारण
- मौसम बदलने के दौरान
- श्वास नली में इन्फेक्शन के कारण
लक्षण:
- सांस फूलना
- सांस लेने में तकलीफ होना
- सास का उखड जाना
- अत्यधिक खांसी आना
- अत्यधिक थकान महसूस करना
- कोहरे या धुएं से एलर्जी होना
आयुर्वेदिक इलाज :
अस्थमा के उपचार के लिए आयुर्वेद में श्वास कुठार रस, काफ्केतु रस, सितोपलादि चूर्ण , तालीसदी चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, सोमलता चूर्ण, टंकण भस्म, सफटिक भस्म, कनकासव, दशमूलारिष्ट, सौधवादी तेल जैसी अत्यंत प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध है ।
16. पुरानी खांसी :-
पुरानी खासी एक खासी है जो 3 हफ्ते से अधिक समय तक रहती है कभी-कभी वयस्को या बच्चों में पुरानी खांसी महीनों या वर्षों तक भी रह सकती है |
कारण :
दमा (सहित गंभीर अस्थमा), क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस (गंभीर , दीर्घकालिक सूजन और ब्रोचि की जलन) ,गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रिफ्लक्स रोग ( जीईआरडी ) , साइनसिसिटिस ( साइनस की सूजन, सिर में खोखली गुआएं जो उस हवा को छानने और नम करने में मदद करती है जिसमें हम सांस लेते हैं ) , निमोनिया, चिरकालिक प्रतिरोध फुफ्फुसीय रोग (सीओपीडी ) , फेफड़ों में संक्रमण, फेफड़ों का कैंसर, वायु प्रदूषण, काली खासी, एसीई इनहिंबिटर ( उच्च रक्तचाप के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं ) एलर्जी , धूम्रपान ।
लक्षण:
कफ युक्त खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, छाती में दर्द, गले में घुंघरू की आवाज आना और नाक बंद होना ।
उपचार :
- एक चम्मच अदरक के रस को शहद के साथ चाटने से सूखी खांसी में आराम मिलता है ।
- तुलसी के पत्तों को पानी में उबालकर इसका काढ़ा बनाकर पिएँ ।
- दो बड़ी चम्मच मुलेठी के चूर्ण को दो से तीन गिलास पानी में डालकर उबालें और 10 से 15 मिनट तक इसकी भाप लें ।
आयुर्वेदिक औषधियां:
- श्वास कुठार रस ,
- टंकण भस्म ,
- सितोपलादि चूर्ण,
- तलीसादी चूर्ण,
- हरिद्रा खंड,
- महालक्ष्मी विलास रस,
- मुलेठी चूर्ण ।
17. COPD:-
CHRONIC OBSTRUCTIVE PULMONARY DISEASE (COPD) फेफड़ों का एक ऐसा रोग है, जिसमें मरीज सामान्य रूप से सांस नहीं ले पाता। सीओपीडी रोग में मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है, गहरी सांस लेना, और समय के साथ- साथ मरीज की हालत भी बिगड़ती जाती है।
कारण :
- वायु प्रदुषण
- रसायनों के संपर्क में
- औद्योगिक धूल और धुएं के संपर्क में
- रोज सड़कों पर गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ ।
- धूम्रपान करने की लत
- बीड़ी या हुक्का
- यहां तक कि व्यायाम के हल्के रूप, जैसे सीढ़ियां चढ़ना, सांस की तकलीफ का कारण बन सकते हैं।
लक्षण:
- छाती में जकड़न
- लंबे समय तक खांसी, बलगम के साथ या बिना
- सर्दी, फ्लू, या अन्य श्वसन रोग नियमित रूप से शारीरिक गतिविधिया कर रहे हैं।
- बलगम जो हरा, पीला या रंगहीन होता है।
- ज्यादातर समय थकान और कमजोरी
- सांस लेते समय सीटी की आवाज (घरघराहट)।
- नीले रंग के नाखून या होठ ।
उपचार :
- धूम्रपान छोड़ो।
- रासायनिक धुए धूल और धुए के संपर्क में आने से रोके।
- खूब पानी पिएं।
- नियमित रूप से व्यायाम करें।
- स्वस्थ आहार लें।
- नियमित जांच के लिए अपने डॉक्टर से मिलें।
18. Hepatitis B and C :-
हेपेटाइटिस बी या सी वायरस का संक्रमण से यकृत को गंभीर क्षति हो सकती है जो लिवर सिरोसिस (पूर्ण स्कारिग ) से यकृत की विफलता और यहां तक कि कुछ मामलों में यकृत का कैंसर हो सकता है ।
कारण :
दोनों घातक संक्रमण हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमित व्यक्ति से दूषित वक्त हस्तांतरण के माध्यम से फैलता है नशीली दवाएं शराब पीना असुरक्षित यौन संबंध समय पर टिकाना लगवाने से नेल कटर कपड़े इत्यादि को साझा करने से ।
लक्षण:
जॉन्डिस या पीलिया , यूरिन का रंग बदलना , बहुत अधिक थकान , उल्टी या जी मिचलाना , पेट दर्द और सूजन , खुजली , भूख ना लगना या कम लगना , अचानक से वजन कम हो जाना ।
उपचार :
- खूब पानी पिए
- ताजे फलों का जूस पिए
- अल्कोहल का सेवन कम करें
- गेहूं का सेवन करें
- जंक फूड मैदा से बने फूड्स
- मीठी चीजों के सेवन से बचें
आयुर्वेदिक उपचार :
भुम्यमलकी क्वाथ , गुडुची सत्व , निंबक्वाथ
19. Liver corrhosis (लिवर सिरोसिस ):-
लिवर सिरोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें लीवर में धीरे-धीरे खराबी आने लगती है और लीवर सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता है । लिवर सिरोसिस एक गंभीर लिवर समस्या है जिसमें मृत्यु की संभावना बहुत अधिक रहती है । लीवर की बीमारियों में लिवर सिरोसिस को लिवर खराब होने का अंतिम चरण माना जाता है ।
कारण :
लंबे समय तक शराब का सेवन , हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण , फैटी लीवर ,दवाएं जैसे कि मैथोट्रेक्सेट( Methotrexate) का अधिक प्रयोग , अनुवांशिक पाचन संबंधी विचार , शारीर में अधिक आयरन हो जाना , लीवर में तांबे का संग्रह (विल्सन रोग ) , पित्त नलिकाओ का कमजोर होना ( बिलायरी अस्ट्रेसिया ) , शुगर मेटाबॉलिज्म के अनुवांशिक रोग ( गैलेक्टोसेमिया या ग्लाइकोजन स्टोरेज रोग ) , पित्त नलिकाए खराब होना ( प्राइमरी बिलायरी सिरोसिस )
लक्षण:
ऊपरी पेट पर रक्त कोशिकाएं त्वचा पर दिखाई देना , हथेलियां लाल होना , भूख कम लगना , खुजलीदार त्वचा, वजन कम होना , लीवर वाली जगह पर दर्द होना या छूने पर दर्द महसूस होना , मांसपेशियों में ऐंठन , नाक से खून बहना , दाहिने कंधे में दर्द होना , सांस फूलना , मसूड़ों से खून बहना , मल का रंग तारकोल जैसा होना या अधिक पीले रंग का मल आना , पेशाब का रंग गहरा होना, उल्टी के साथ खून, बार बार बुखार होना, और संक्रमण के जोखिम बढ़ना, टांगो, पैरों, व टखनो में तरल पदार्थ बनना (यह स्थिति को एडिमा के नाम से भी जाना जाता है ) ,पीलिया या त्वचा पीली होना और आंखों व जीभ सफेद होना ।
उपचार :
- शराब का सेवन बिल्कुल बंद कर दें
- संतुलित जिसमें वास की मात्रा बिल्कुल कम हो जैसे फल सब्जियां आदि
- अगर क्रॉनिक हेपिटाइटिस संक्रमण के कारण लीवर सिरोसिस हुआ है तो एंटीवायरस थेरेपी (कुछ एंटी-वायरस दवाए चलाई जाती है जैसे एटेकाविर , टेनोफोविर आदि) दी जाती है ।
- अगर लिवर सिरोसिस नॉन अल्कोहलिक फैटी लीवर के कारण हुआ है तो उपचार के साथ-साथ वजन घटाने ब्लड शुगर को कम करने से आराम मिल सकता है
- अगर लिवर सिरोसिस के कारण लिवर काम करना बंद कर देता है तो सिर्फ लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपचार है
आयुर्वेदिक उपचार :
पुनर्नवा मण्डूर , भूम्य आमलकी , ताप्यादि लौह, गौमूत्र हरीतकी , मकोय अर्क , जलोदरादि रस |
20. BPH ( Benign Prostatic Hyperplasia):-
पौरुष ग्रंथि का आकार में धीरे धीरे बढ़ना जिससे पेशाब करने में समस्या हो सकती है उसे BPH (पौरुष ग्रंथि वृद्धि) कहा जाता है।
कारण :
बीपीएच का वास्तविक कारण अच्छी तरह से समझा नहीं गया है। पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन भी कम होने लगता है। यह, बदले में, सिस्टम में एस्ट्रोजेन के अनुपात को बढ़ाता है। अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन के बीच इस अनुपात के कारण सौम्य प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया का परिणाम हो सकता है। प्रोस्टेट के भीतर एस्ट्रोजन का उच्च स्तर उन पदार्थों की गतिविधि को बढ़ा देता है जो प्रोस्टेट कोशिकाओं के विकास को बढ़ाते हैं।
BPH के जोखिम कारक (Risk Factors):
- आयु: बीपीएच आमतौर पर 50 से अधिक उम्र के पुरुषों में देखा जाता है।
- परिवार के इतिहास
- हार्मोनल असंतुलन
- मोटापा
- जीवनशैली के कारक
- चिकित्सा की स्थिति
- धूम्रपान
- शराब का सेवन………
कारण :
बीपीएच का वास्तविक कारण अच्छी तरह से समझा नहीं गया है। पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन भी कम होने लगता है। यह, बदले में, सिस्टम में एस्ट्रोजेन के अनुपात को बढ़ाता है। अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन के बीच इस अनुपात के कारण सौम्य प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया का परिणाम हो सकता है। प्रोस्टेट के भीतर एस्ट्रोजन का उच्च स्तर उन पदार्थों की गतिविधि को बढ़ा देता है जो प्रोस्टेट कोशिकाओं के विकास को बढ़ाते हैं।
लक्षण:
- पेशाब का बहाव कम होना
- अधूरा मूत्राशय खाली होने की अनुभूति
- लगातार पेशाब आना
- मूत्र संबंधी हिचकिचाहटमूत्र
- प्रवाह के अंत में ड्रिब्लिंग
- बार-बार पेशाब करने का आग्रह करना
- पेशाब करने के लिए रात में उठने की आवश्यकता बढ़ जाती है
- पेशाब करते समय दर्द होना या स्खलन…………
उपचार :
- शराब का सेवन बिल्कुल बंद कर दें
- संतुलित जिसमें वास की मात्रा बिल्कुल कम हो जैसे फल सब्जियां आदि
- अगर क्रॉनिक हेपिटाइटिस संक्रमण के कारण लीवर सिरोसिस हुआ है तो एंटीवायरस थेरेपी (कुछ एंटी-वायरस दवाए चलाई जाती है जैसे एटेकाविर , टेनोफोविर आदि) दी जाती है ।
- अगर लिवर सिरोसिस नॉन अल्कोहलिक फैटी लीवर के कारण हुआ है तो उपचार के साथ-साथ वजन घटाने ब्लड शुगर को कम करने से आराम मिल सकता है
- अगर लिवर सिरोसिस के कारण लिवर काम करना बंद कर देता है तो सिर्फ लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपचार है
आयुर्वेदिक उपचार :
- वरुणादि वटी
- कंचनार गुग्गुलु
- शिलाजीत
- गोक्षुर चूर्ण
- वरुणादि क्वाथ
- पुनर्नवा कषाय
- चंद्रप्रभा वटी
- यवक्षार
- श्वेत पर्पटी
- कुष्मांड बीज
- गोक्षुरादि गुग्गुलु
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