सर्वाइकल स्पोंडीलोसिस अर्थात् सर्वाइकल दर्द जो गर्दन की हड्डियों में होता है। यह उम्र के साथ या बिना उम्र के भी हो सकता है । पुराने समय में सर्वाइकल सिर्फ बुढ़ापे अर्थात् पच्चास वर्ष से अधिक आयु के लोगो में पाया जाता था, किन्तु आजकल की बदलती जीवनशैली के कारण यह किसी भी आयु वर्ग में हो सकता है।
यह उम्र से संबंधित ऐसी स्थिति है जिससे गर्दन की हड्डियों में सूजन और दर्द होता है ।
वह रोग जिसमे कमर की नसों (Sciatic nerve) पर दबाव पङने से व्यक्ति को एक तरफ के पैर मे पीठ के निचले हिस्से से पैर की अंगुलियों तक दर्द महसूस होता है।
अधिक व्यायाम करना, अधिक चलना, अधिक ठंडी हवा लगना, रात को जागना, कठोर आसन पर बैठना आदि |
इसमे आयुर्वेद औषधि व पंचकर्म द्वारा बिना किसी साइड इफेक्ट्स के लाभ मिल सकता है।
आयुर्वेद मे गृध्रसी के लिए निम्नलिखित योग बताए गए है।
मालिश – सैन्धवादि तैल के द्वारा धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिए
रोगी को तख्त पर सोना चाहिए।
जब बाहरी कारण (जैसे पैर मुड़ना चोट लगना आदि) से लिगामेंट में आघात हो जाता है उसे लिगामेंट टियर कहते हैं
इसमें आयुर्वेद औषधि व पंचकर्म द्वारा बिना किसी साइड इफेक्ट के लाभ मिल सकता है –
रूमेटाइड आर्थराइटिस को सामान्य भाषा मे गठिया कहा जाता है। यह पुरुषो की तुलना में महिलाओ मे अधिक पाया जाता है।
रूमेटाइड अर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है जो जोड़ो में दर्द, सूजन और जकड़न का कारण बनती हैं। यह एक आटोइम्यून बीमारी है जिसमे शरीर की इम्यूनिटी स्वस्थ कोशिकाओं को ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती हैं। 50-60 से अधिक उम्र के लोगों में इसका खतरा सबसे अधिक होता है।
आयुर्वेदिक औषधियों और पंचकर्मा से काफी हद तक रूमेटॉयड आर्थराइटिस की बीमारी में बिना किसी साइड इफेक्ट के आराम मिल सकता है।
आयुर्वेद मे आमवात के लिए निम्न-निम्न योग बताए है।
ठंडा सेक:- आइस पैक की मदद से दर्द व सुजून मे राहत पा सकते है, इसके लिए रोजाना 30 मिनट ठंडा सेंक करें।
मालिश: मालिश आपकी मांसपेशियो और जोड़ो के दर्द में राहत का कार्य करती है, मालिश के लिए महानारायण तेल का प्रयोग कर सकते है।
अदरक अजवाइन, सौंफ, हींग, लहसुन, जीरा, एरण्ड तेल का उपयोग करें।
संधिगत वात एक ऐसा रोग है जिसमे जोड़ो में दर्द वा सूजन होने से चलने में तकलीफ होती है। इसमें जोड़ो के बीच पाए जाने वाला द्रव पदार्थ सूख जाता है जिससे उनमें रगड़ होने लगती है। इसमे चलते वक्त जोड़ो में कट कट की आवाज आती है। यह बुजुर्गों में अधिक पाया जाता है।
#इसमें घी, तेल, गेहूं, पुराने चावल, नारियल पानी, अनार, लहसुन खाना चाहिए। इसमें चना, मूंग की दाल, अरहर, करेला न खाए ।
घरेलू नुस्खे साइकिल चलाना, मालिश करना, दूध में हल्दी मिलाकर रात मे पीना, जोड़ो पर ठंडे वा गरम पैक लगाना आदि।
इसमे आयुर्वेद औषधि व पंचकर्म द्वारा बिना किसी साइड इफेक्ट्स के लाभ मिल सकता है-
यह त्वचा, मांस व छोटी सन्धियो/छोटे जोड़ो में होने वाली बिमारी है। इस व्याधि में छोटी सन्धियो/छोटे जोड़ में सूजन व दर्द होता है। दर्द होने का कारण सन्धियो का टेढ़ा होना है। यह रोग पैर / हाथ की अंगुलि से होना शुरू होता है। यूरिक एसिड के बढ़ जाने से यह बिमारी होती है।
आयुर्वेदिक औषधियों और पंचकर्म से इसमें लाभ मिल सकता है। आयुर्वेद में योगों के बारे में बताया गया है-
जैसे-
प्रोटीन वाली चीजें न खाना, जैसे- बैसन, गोभी, बैंगन, मशरूम व दाल को कम मात्रा में पतली दाल को रोज न खाए। घर में बनाई जाने वाली कड़ी को भी न खाए क्योंकि वह बेसन से बनती है और बेसन चना दाल से जिसमे प्रोटीन ज्यादा होने से यूरिक एसिड को बढ़ाता है।
दिनचर्या व ऋतुचर्या का पालन करना चाहिए। पुराने गेहूं व जौं, शाली व साठी चावल का सेवन करना चाहिए।
वह रोग जिसमें मांसपेशियों और हड्डियों में दर्द उत्पन्न होता है उसे फाइब्रॉम्याल्जिया कहते हैं ।
फाइब्रॉम्याल्जिया के रोगियो के लिए आयुर्वेद में महायोगराज गुग्गल , योगराज गुग्गल , महावातविध्वंस रस , प्रवाल पिष्टी , स्वर्ण माक्षिक भस्म , गोदंती भस्म . महारास्नादि क्वाथ , चद्रप्रभा वटी , विषतिंदुक वटी जैसी अत्यंत गुणकारी औषधियां उपलब्ध है।
Degenerative disc को आपकर्षक कुडंल रोग भी कहा जाता है । रीड की हड्डी में मौजूद एक या एक से ज्यादा डिस्क के कमजोर होने पर यह स्थिति उत्पन्न होती है । डीडीडी कोई बीमारी नहीं है बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ने वाली स्थिति है यह किसी चोट या किसी अन्य कारण से हो सकती है |
मालिश करना , दूध में हल्दी मिलाकर पीना
इसमें आयुर्वेद औषधि व पंचकर्म द्वारा बिना किसी साइड इफेक्ट के लाभ मिल सकता है –
इस बीमारी में हड्डी कमजोर हो जाती है जिससे कुल्ले, रीड की हड्डी और कलाई में फ्रैक्चर का खतरा बढ़ रह जाता है। एक ऐसी बीमारी है जिसमें हड्डियां अंदर से खोखली हो जाती है उनके टूटने और फ्रैक्चर होने का खतरा बढ़ जाता है यह बीमारी 50 की आयु में बढ़ जाती है जिसमें मनुष्य की बॉडी मास लगातार घटने लगता है। महिलाओं में यह बीमारी पुरुषों की तुलना में अधिक होती है।
शरीर का अतरीक्त वजन कम करें, नियमित व्यायाम करें, तनाव से बचें । जैसे फल खाएं अंगूर – अनार और आम , जोड़ों के लचीलापन से में सुधार के लिए आसन करें , अपने आहार में कुल्थ , शुथि, कुष्मांडा को शामिल करें, धूम्रपान और शराब पीना छोड़ दें ।
अधिक ना चले , अधिक व्यायाम ना करें , नमकीन या तीखा भोजन ना खाएं , काफी का अधिक सेवन ना करें ।
प्रत्येक डिस्क में केंद्रीय नरमे हिस्सा और बाहरी रबड़ वाला हिस्सा होता है । जब यह नरम आंतरिक भाग किसी बाहरी या आंतरिक कारण के कारण बाहरी रबर वाले हिस्से से बाहर निकल जाता है तो इससे हर्नियेटेड या स्लिप्ड डिस्क या प्रोलैप्सड इंटर वर्टेब्रल डिस्क कहा जाता है।
इसमें आयुर्वेद औषधि वह पंचकर्म द्वारा बिना किसी साइड इफेक्ट के लाभ मिल सकता है –
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