अर्थात आंखों की कमजोरी के कारण कम दिखना है अथवा धुंधला दिखाई देना।
बार-बार आंखें झपकाना, दूर की चीजें देखने पर आंख में तनाव और थकान महसूस होना, ड्राइविंग करने में परेशानी आना खासकर रात के समय में, सिरदर्द, पलकों को सिकुडकर देखना, आंखों से पानी आना ।
आंखों को दिन में दो बार ठंडे पानी से धोना चाहिए, पढ़ते समय रोशनी का विशेष ध्यान रखना चाहिए, घुल, प्रदूषण एवं तेज धूप से आंखों को बचाना चाहिए, बहुत देर तक लगातार पढ़ना या कंप्यूटर पर काम करने के कारण आंखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसलिए कुछ देर के अंतराल में आंखों को बंद करके आराम देना चाहिए, संतुलित आहार विशेषकर दूध, फल व सब्जियों का सेवन करना चाहिए, गाजर एवं आंवले का नियमित सेवन करना चाहिए ।
आंख आना या नेत्र शोथ आंख के सफेद भाग की बाहरी सतह और पलक के आंतरिक भाग की सूजन हो जाती है । इसमें आंख लाल या गुलाबी दिखाई देती है ।
बैक्टीरिया या वायरस संक्रमण, एलर्जी होना, जलन करने वाले पदार्थ का ज्यादा इस्तेमाल, लेंस या आई ड्रॉप्स के कारण नेत्र प्रभावित होकर लालिमा युक्त हो जाते हैं ।
कुछ मामलों में यह समस्या बिना उपचार के ठीक हो जाती है परंतु कुछ मामलों में इलाज कराना पड़ता है ।
पुनर्नवासव, त्रिफला चूर्ण, किशोर गूगल खाने के लिए वे त्रिफला क्वाथ और मंजिष्ठ क्वाथ आंखों में डालने के लिए प्रयोग करें ।
आंखों को गंदे हाथों से ना छुएं, दिन में ना सोना, अपनी वस्तुएं दूसरों से ना बांटना, अधारणीय वेग को धारण ना करना आदि।
आंखों में एलर्जी को एलर्जी कंजेक्टिवाइटिस भी कहते हैं ।
आंख में जलन करने वाले पदार्थ जैसे धूल, धुआं आदि, बैक्टीरिया और वायरस के संक्रमण से, प्रतिरक्षा तंत्र के खराब होने से।
आंखो से पानी आना, खुजली, लालिमा, दर्द, सूजन और आंख में चुभन महसूस होने लगती है । आंखों में खुजली होना आग आंखों की एलर्जी एक मुख्य लक्षण है ।
महात्रिफला घृत, त्रिफला चूर्ण, हरिद्रा खंण्ड, पटोलआदि घृत ।
यह एक मध्य कान की सूजन संबंधी एक बीमारी का समूह है। यह शारीरिक रचना और प्रतिरोधक प्रणाली से संबंधित है। यह बीमारी बच्चों में बेहद आम है व कान मे दर्द के साथ शुरू होता है।
श्वसन संक्रमण के बैक्टिरियल व वायरल संक्रमण को ही इसका कारण पाया गया है। एलर्जी से भी संभवत संक्रमण कान में हो सकता है।
कान में दर्द, कान से स्राव होना, कान में सुनाई ना देना, अतिसार, चिड़चिड़ापन आदि इसके मुख्य लक्षण पाए जाते है।
कान को डालने के लए वचा लसून आदि तेल, श्रार तेल, तुलसी वरस । खाने के लए सूरसआदि चूर्ण, रस माणिक्य, हरा खण्ड, सरिवादी वटी।
कान को प्रतिदिन क्वाथ द्वारा साफ करे, स्वच्छ पानी का इस्तेमाल करे।
बाहर कोई ध्वनि न हो तब भी कान में कुछ सुनाई पड़ना कान बजना या कर्णक्ष्वेण (Tinnitus) कहलाता हैं।
कान का इन्फेक्शन,साइनस इन्फेक्शन,मैल जमा होने के कारण कानो का बंद होना, शोर भरी आवाजों के लगातार संपर्क में आना, शोर भरी आवाज के अचानक संपर्क में अना,सर या गर्दन की चोट, ऐण्टि डिप्रैसैण्ट दवाओं, के दुष्प्रभाव, अत्यधिक तनाव एवं थकान, शरब या पेय पदार्थ का अत्यधिक सेवन तथा सिगरेट पीना टिन्निटस के मरीज़ की हालत को बिगाड़ सकते हैं, माइग्रेन का सरर्दद।
टिन्निटस से ग्रसित मरीज इसका वर्णन अक्सर लगातार या रह-रह कर गूंजने की, सीटियाँ बजने की, चहचहाने की या फ़ुफ़कारने की ध्वनियों के रुप में कहते हैं।
टिनिटस बीमारी से बचाव के लिए सबसे पहले आपको अपने कानों की सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए। साथ ही आपको तेज आवाज में गाना सुनने से बचना चाहिए। साथ ही समय-समय पर अपने कान साफ कराते रहें।
टिनिटस की बीमारी मे आयुर्वेद में बिल्वादि तेल और सारिवादि वटी का बहुत अच्छा प्रभाव है।
(Deviated septum) में सरक कर एक तरफ विस्थापित हो जाता है। जिससे एक और का नाक का छिद छोटा या बंद हो सकता हैं। स्थिति कभी-कभी इतनी गंभीर हो जाती है कि नाक से ब्लीडिंग भी होने लगती है।
एक या दोनों नथुने की रुकावट, दर्द, खराटे, नाक से खून अना, सोते समय आवाजें अना।
क्यों हो जाता है डेविएटेड सेप्टम –
यह समया तब होती है जब आपकी नाक के छिद्रों को विभाजित करने वाली बीच की झिलली की एक तरफ सरक जाती है। इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं – जन्मजात, नाक के चोट से, Rhinitis से
DNS की मे आयुर्वेद में लक्ष्मी विलास रस, महालक्ष्मी विलास रस, हरिद्रा खंड, चित्रक हरीतकी, अणु तेल, षडबिंदु तेल जैसी प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध है।
(Allergy RHINITIS) नजला रोग एक ऐसा रोग है जसमे मरीज को लगातार नाक से पानी आता है, छींके और कफ जैसी परेशानी होने लगती है। नजला एक बहुत भयकंर बीमारी का रूप ले सकता है अगर इसका इलाज ठीक समय पर और सही जगह नहीं कराते है तो, हर 8 में से1 को पुराने नजलेक समया होती है।
मौसम परिवर्तन, प्रदूषण,शरीर पर आते हूए पसीने पर स्नान करना,पसीने आने पर ठंडा पानी पीना,धुल मिट्टी के कणो का नाक में चला जाना, जेनेटिक बमारी जोकि हमारे माता या पता से मिली हो,राइनोवायरस इसका सबसे आम कारण है वायरल इन्फेकसन इसका एक मुख्य कारण है।
नाक से पानी आना ,गाढ़ा बलगम, छींक आना, कान में आवाज आना,सिरदर्द रहना, गले में सुखी खांसी, नाक की हड्डी बढ़ना, नाक बदं रहना, गला बठैना यादर्द होना ,दम फूलना,खांसी, बाल का झड़ना और सफ़ेद होना,बुखार आना ,सुंघने व स्वाद की श्रमता खत्म होना।
नाक के भीतर नेजल पैसेज या साइनस में कोमल, बना दर्द वाली, गैर कैंसर वाली गांठ को नेजल पॉलिप्स कहा जाता है।
अस्थमा, इंफेक्शन के दोबार होने, एलर्जी, दवा के प्रति संवेदनशीलता या कुछ इम्यून सिस्टम की बीमारियो की वजह से नेजल पॉलिप्स होती है।
सांस लेने मे परेशानी, और बार-बार इंफेक्शन होने की परेशानी हो सकती है, सूंघने की शक्ति कम होना यान होना, स्वाद पहचानने की शक्ति खत्म होना, चेहरे या सिरदर्द, ऊपरी दांतो मे दर्द।
अस्थमा को कंट्रोल में रखना।
नाक में जलन पैदा करने वाले पदार्थो से बचना, अच्छी हाइजीन की आदते अपनाना।
जब टाँन्सिल्स में कीसी भी प्रकार का संक्रमण होता है तो इनके आकार में बदलाव और सूजन आ जाती है। इसेटॉसलाइटस(Tonsillitis) कहते है।
आयुर्वेद में टॉन्सिल्स के लिए टंकण भस्म, सोम योग, सफटका भस्म, चित्रकहरीतक जैसी प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध है।
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