गौस्ट्रिक अल्सर (Gastric ulcer) यानि पेट की भीतरी परत पर होने वाले घाव को मौस्ट्रिक अल्सर यानी पेट के घाव कहते हैं।
ज्यादतर अल्सर का कारण एच पायलोरी बैक्टिरियल इन्फेक्शन होता है। दर्द दवाइयों के सेवन और मानसिक तनाव से भी पेट में घाव का खतरा बढ़ जाता है। वहीं शराब के लत, बाहर का तला खाना व धूम्रपान से भी ये स्थिति हो सकती है।
अल्सर के कारण पेट में दर्द, कच्चा मन होना, खट्टी डकार आना, उल्टी होना, सीने में जलन होना, गहरा मल आना आदि लक्षण आते हैं
यदि शराब व धूम्रपान पर काबू करे तो कुछ हद तक असर ठीक हो सकते हैं मिर्च मसाले व तेल का सेवन कम करे।
परहेज के साथ साथ उपचार जैसे सूत शेखर रस, कामदुधा रस, शखं भस्म, अविपत्तिकर चूर्ण लेने से अल्सर से राहत मलती है।
ड्यूडेनल अल्सर (Duodenal ulcer) यानि छोटी आंत के ऊपरी भाग में घाव हो जाना। कारण- एच पायलॉरी बैक्टिरियल इन्फेक्शन, दर्द निवारक दवाइयों का ज्यादा प्रयोग ।
इन अल्सर के कारण भूख न लगना, पेट में दर्द, मल में खून आना, सांस लेने में तकलीफ होना, बेहोशी छाना, वजन घटना, पेट फूलना आदि।
सावधानी- मिर्च मसाले व तला भोजन न करे, अधिक तेल प्रयोग न करे, केमिकल युक्त दवाइयों का कम प्रयोग आदि।
जब पेट मे ऐसिड अथवा तेजाब अधिक बनने लगता है, उसे ऐसिडिटी कहते हैं।
अधिक मिर्च- मसालों से बना हुआ भोजन करना,नॉन वेजिटेरियन भोजन का अधिक प्रयोग, धूम्रपान करना एवं शराब का अधिक सेवन करना, मानसिक तनाव लेना, अत्यधिक दर्द निवारक दवाईयों का प्रयोग,अधिक उर्वरकों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन।
सीने में जलन जो भोजन करने के बाद अधिक होती है, खट्टी डकारों का आना,मुँह का स्वाद कड़वा होना,पेट फूलना,मिचलाहट होना एवं उल्टी आना,गले में घरघराहट होना,साँस लेते समय दुर्गन्ध आना,सिर और पेट में दर्द।
इसे पेट या आंतों की गैस और पेट फूलना के रूप में भी परिभाषित किया जाता है, यह एक अपशिष्ट गैस होती है जो पाचन के दौरान बनती है। यह गैस आम तौर पर गुदा (anus) से होते हुऐ कई बार गंध और आवाज के साथ बाहर निकलती है।
राजमा, मटर, मसूर, बंदगोभी, फूलगोभी, प्याज, ब्रोकोली, मशरूम और साबुत अनाज हैं। इसके अलावा कुछ प्रकार के फल, बीयर और अन्य कार्बोनेटेड पेय पदार्थ भी पेट में गैस उत्पन्न करने का काम करते हैं। अगर गैस में वृद्धि होती जा रही है, तो कुछ समय के लिए इन चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए।
आयुर्वेद में पेट में गैस के लिए बहुत सारी दवाइयां उपलब्ध है जैसे हिंग्वाष्टक चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, शिव चार पाचन चूर्ण, शिवाक्षर पाचन चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, अभयारिष्ट, त्रिफला चूर्ण, हरीतकी चूर्ण आदि
पेट का कैंसर, जिसे गैस्ट्रिक कैंसर भी कहते हैं, पेट की सबसे भीतरी परत में म्यूकस-उत्पादक कोशिकाओं में शुरू होता है। यह फिर बढ़ता है और फैलता है। यह पहले पेट की दीवार में फैलता है और फिर बढ़ कर आस पास के उत्तकों में फैल जाता है। बाद में ये जिगर (यकृत), फेफ़ड़े और पेरिटोनियम में फैल जाता है।
एच पाइलोरी (H. pylori) नामक एक जीवाणु से संक्रमण,पेट में लगातार सूजन,पेट में कुछ प्रकार के पॉलिप्स,धूम्रपान,मोटापा,स्मोक्ड, अचारित या नमकीन खाद्य पदार्थों से युक्त आहार
अपच, पेट में जलन और पेट फूलना,लगातार कमजोरी या थकान महसूस करना,भूख न लगना,वजन कम होना,हीमोग्लोबिन में कमी ,पेट में दर्द या बेचैनी,मल में लाल खून का धब्बा या काले रंग का मल,थोड़ी मात्रा में भोजन करने के बाद पेट भरा हुआ महसूस होना,मतली और उल्टी (रक्त के साथ या इसके बिना)
स्टेजिंग से बीमारी के प्रसार का पता चलता है।यह पता लगाने के लिए परीक्षण करते हैं कि ट्यूमर कितना फैल गया है। इसके लिए निम्नलिखित जांच करवानी चाहिए -CT स्कैन,PET स्कैन, एंडोस्कोपी।
पेट के कैंसर का उपचार ट्यूमर के चरण पर निर्भर करता है। शुरुआत के चरणों के पेट के कैंसर का प्राथमिक उपचार सर्जरी है।
बढे हुए कैंसर (स्थानीय प्रसार), कीमोथेरेपी और/या रेडियोथेरेपी और सर्जरी को संयोजित किया जाता है जिसे मल्टीमॉडल उपचार कहते हैं।
एनोरेक्सिया’ (Anorexia) को भूख की कमी (Lack of Appetite) के रूप में देखा जाता है। यह एक अस्थायी समस्या है. इसमें लोगों को भूख बहुत कम लगती है। इस विकार से पीड़ित व्यक्ति में भोजन के प्रति अरुचि विकसित हो जाती हैं।
अनेक कारणों से हो सकती है जैसे मोटे होने का डर, पेट खराब होना, मानसिक तनाव और कोई लंबी बीमारी से ग्रस्त होने के कारण
पतला और कुपोषित दिखना, अत्यधिक वजन घटाना, अनिद्रा, थकान, चक्कर आना, बेहोशी के दौरे, छिलकेदार त्वचा, पेट में दर्द, कब्ज
आयुर्वेद में भूख बढ़ाने के लिए हिंग्वाष्टक चूर्ण, लवण भास्कर चूर्ण, शिव क्षार पाचन चूर्ण, अभयारिष्ट, शंख वटी, महाशंख वटी, गैस हर वटी, सौंफ अर्क, अजवाइन अर्क, मकोय अर्क, कासनी अर्क जैसी अनेकों औषधियां उपलब्ध है! हींग का प्रयोग करे, जो भूख बढ़ाने और पाचन में सुधार करने के लिए जाना जाता है। यह पेट की ऐंठन में भी राहत दिलाता है।
आम तौर पर एक सप्ताह में तीन से कम बार मल त्याग करने को कब्ज होना कहा जाता है। कब्ज एक सामान्य समस्या है जो सभी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि आप नियमित रूप से मल पास नहीं कर पा रहे हैं या पूरी तरह से आपका पेट साफ नहीं हो रहा है।
अल्पकालीन किडनी की विफलता वह है जो कुछ घंटों या कुछ दिनों में उत्पन्न हुई हो। यह एक ऐसी बीमारी हैं जो शरीर में पहले से मौजूद अन्य बीमारियों के साथ जैसे दिल की बीमारी , यकृत विफलता आदि के साथ उत्पन्न हो जाती है। इस बीमारी में किडनी अचानक से शरीर के तरल , लवण न अपशिष्ट पदार्थों को छानकर शरीर से बाहर निकालने की क्षमता को खो देती है।
शरीर में ऐसी स्थिति दे जाना जिसके कारण किडनी में रक्त की आपूर्ति नहीं हो पाती। किडनी से मूत्राशय तक मूत्र ले जाने वाली मूत्रवाहिनियों में रुकावट से अपशिष्ट पदार्थों का बाहर न निकाला जाना। गंभीर मा आसानी पानी की कमी हो जाना आदि इसके कारण हैं। आंतों के संक्रमण के कारण गंभीर उल्टी व दस्त लगाना। रक्त प्रभाव में गंभीर संक्रमण हो जाना आदि।
उच्च रक्तचाप, शरीर में साजिश आ जाना सांस आने में परेशानी न थकान महसूस होना, मूत्र मात्रा में कमी आना। एमू ख कम लगना जी मिलना, व उल्टी आना आदि।
अल्पकालीन किडनी की विफलता के इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण एभूमिका हैं कि कारण जानकर उसका इलाज करना।
गोक्षुरादि गुलगुले, पुनर्नवा अरिष्ट, वरुणादि कषाय, चन्दनादि वटी, वरुणादि वटी।
परिभाषा क्रोनिक किडनी रोग (CKD) एक ऐसी स्थिति है जिसमे किडनी धीरे धीरे काम करना बंद कर देती है। जब यह बीमारी बढ़ती है, तो शरीर में तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट और अपशिष्ट पदार्थ बढ़ जाते हैं। जिससे उच्च रक्तचाप, खून की कमी, कमजोर हड्डियां, खराब पोषण, तंत्रिका क्षति हो सकती है।
मधुमेह रोग, अत्यधिक रक्तदाब, गुर्दे की धमनी का सिकुड़ जाना व भ्रूण विकास संबंधी समस्या ।
आंखों के आस पास सूजन, अपर्याप्त भूख, नींद न आना, बार बार पेशाब आना, सूजे पैर व टखने, सूखी खुजली वाली त्वचा आदि।
पुरानी गुर्दे की बीमारी का वास्तव में कोई ईलाज नही है। वही दूसरी ओर कुछ दवाइयों का प्रयोग संकेतों और लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकती हैं।
क्रॉनिक किडनी डिजीज के मरीजों में आयुर्वेद में अन्य किसी चिकित्सा पद्धति के अलावा बहुत अच्छे रिजल्ट है आयुर्वेद में सीकेडी के मरीजों को ठीक करने के लिए बहुत अच्छी-अच्छी ओसधियाँ उपलब्ध है जैसे पुनर्नवा मंडूर, गोक्षुर आदि गुगगुल, वरुणादि क्वाथ, वरुणदि वटी, भूम्यमलकी वटी आदि गुर्दे की बीमारी में लाभकारी हैं।
गुर्दे की पथरी एक क्रिस्टलीय पदार्थ है जो गुर्दे या मूत्र पथ में कहीं भी हो सकती है। एक छोटा पत्थर लक्षण के मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है।
आयुर्वेद में गुर्दे की पथरी के इलाज के लिए बहुत ही प्रभावशाली औसधियाँ उपलब्ध हैं जैसे चंद्रप्रभा वटी, गोक्ष् रादि गुग्गुल, श्वेत पर्पटी, कुलथी की दाल, त्रिविक्रम रस आदि गुर्दे की पथरी
गुर्दे की पथरी एक क्रिस्टलीय पदार्थ है जो गुर्दे या मूत्र पथ में कहीं भी हो सकती है। एक छोटा पत्थर लक्षण के मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है।
मूत्राशय की सूजन को सिस्टिटिस किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
मूत्र पर्थ के संक्रमण ( UT I ), कैसेटर का निरंतर उपयोग, विकिकरण के लिए एक्सपोजर, परेशान करने वाले स्वच्छता उत्पाद, कुछ दवाएं लेना।
दर्द, पेशाब में जलन या चुभन, अधिक बार पेशाब करना, गहरा और मैला पेशाब, यूरिन पास करने की तत्काल आवश्यकता, पेट के निचले हिस्से में दर्द होना, सामान्य दर्द, कमजोरी, और थकान, बुखार।
गोक्षुर चूर्ण, पुनर्नवा अरिष्ट, गिलोय सत्व।
यह एक स्थिति हैं जहां किसी व्यक्ति के मूत्रमार्ग का लुमेन संकीर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मूत्र प्रवाह प्रतिबंधित होता है। यह ज्यादातर पुरुषों को प्रभावित करता है
मूत्रमार्ग में होने वाली किसी भ्भी तरह की सूजन के कारण, ट्यूमर, आधार, संक्रमण, मूत्रमार्ग इंस्ट्रूमेंटेशन, जटिल सर्जरी, प्रोस्टेट का बढ़ जाना, मूत्राशय का कैंसर।
मूत्र के प्रवाह में बाधा, पेशाब की एक दर्दनाक असहज प्रक्रिया जिसे डिसुरिया भी कहा जाता है, मूत्र पथ में यूटीआई या संक्रमण, मूत्र रि टेंशन, मूत्राशय को खाली करने की एक अधूरी प्रक्रिया, पेशाब की दोहरी स्ट्रीमिंग
आयुर्वेद में चंद्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुल, श्वेत पर्पटी जैसी अत्यंत प्रभावशाली औसधियया उपलब्ध है जो कि यू रियल पिक्चर के मरीजों को एकदम से आराम पहुंचाती है
पोषक तत्वों पीएसी से समृद्ध, यह बैक्टीरिया के संक्रमण को रोकने में मदद कर्क हैं जो कूटा पथ को प्रभावित कर सकता है।
यू. टी. आई तब होता हैं जब मूत्राशय और उसकी नली बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाती है। ई-कोलाई बैक्टिरिया का संक्रमण इसका मूल कारण होता हैं। इस समस्या के कुछ कारण हैं जैसे, लम्बे समय तक पेशाब, रोके रखना, गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति और शुगर। मूत्र पथ के संक्रम्रण, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक आम हैं। आधी महिलाओं को उनके जीवन में कम से कम एक बार संक्रमण होता हैं।
वैसे तो यूटीआई का संक्रमण ई-कोलाई बैक्टीरिया के कारण होता है, लेकिन इसके अलावा और भी लक्ष्ण होते हैं जो इस बीमारी के होने की वजहें होते हैं- विशेषकर यदि संभोग अधिक बार, तीव्र और कई या बहुत लोगों के साथ किया जाये तो यू. टी. आई हो सकता हैं, शुगर के रोगियों को यू. टी. आई होने की खतरा अधिक होता है, अस्वच्छ रहने की आदत, मूत्राशय को पूरी तरह से खाली न करना, दस्त आना, मूत्र करने में बाधा उत्पन्न होने पर, पथरी होने के कारण, गर्भनिरोधक का अत्यधिक उपयोग करने से, रजोनिवृत्ति काल में, कमजोर प्रतिरोधक प्रणाली होते से, एंटीबायोटिक द्वारों का अधिक उपयोग करने से।
वैसे तो यूटीआई की समस्या होने से सबसे पहले मूत्र संबंधी समस्याएं होती है, लेकिन इसके अलावा और भी लक्षण होते हैं। मूत्राशय में संक्रमण होने पर मूत्र मार्ग भोर मूत्राशय की परत में सूजन आ जाना, पेशाब त्याग करते समय दर्द यो जलन महसूस होना, बार-बार पेशाब करने के लिए उठना और बहुत कम मात्रा में मूत्र त्याग होना, एकदिन पेशशान हो जाने का डर लगना, पेशाब से बदबू आना, पेशाब से खून आना, पेट के निचले हिस्से में दर्द होता, हल्की बुखार माना, ठण्ड लगना या कभी-कभी ठण्ड के साथ कंपकंपी लगता, जी मिचलाना।
गोक्षुर में ऊर्जादायक, दर्द निवारक, नसों को राहत देते ताले और कामोत्तेजक (लिबिडो बढाने वाला) गुण मौजूद हैं। पुनर्नवा में मूत्रवर्द्धन गुण मौजूद होते हैं जो कि यूटीआई के मामले में संक्रमित बैक्टीरिया को शरीर से बाहर निकालने में लाभकारी हैं।
शिलाजीत जडी बूटी वात टॉनिक (शक्तिवर्धक) के रूप में कार्य करती हैं वात के खराब होने के कारण यूटीआई के इलाज में असरकारी है।
आमलकी पेशाब के दौरान होने वाले दर्द और शराब पित्त के कारण यूटीआई के इलाज में आमलकी लाभकारी है क्योंकि इसमें पित्त को साफ करने वाले गुण होते हैं।
मुद्रा ( मूंगा दाल) और इसका सूप, तक्र (छाछा), दही, यह (जौ), खर्जूर (खजूर), ठंडा पानी, कूष् मांड (लौकी), एलोवेरा की पत्तियां, परवल, आंवला, धृत, दूध और पुराने चावल को अपने आहार में शामिल करें।
अनुचित खानपान, जीवन शैली अथवा कमजोर प्रतिरोध क्षमता के कारण संक्रमण की चपेट में आने से ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या हो जाती है। यह श्वासनलीयो में होने वाली सूजन कारी बीमारी है जिसमें तीनों दोष विकृत अवस्था में होकर रोग उत्पन्न करते हैं । आयुर्वेद में ब्रोंकाइटिस को श्वनी शोथ कहा गया है, इसमें मुख्यता पित्त दोष की वृद्धि देखी जाती है तथा वात एवं कफ दोष भी असंतुलित रहता है।
ब्रोंकाइटिस होने पर खासी होने के अलावा और भी लक्षण होते हैं, लेकिन प्रकार के अनुसार इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते है:
एक्यूट ब्रोंकाइटिस होने के लक्षण:
गले में खराश, थकान, नाक बंद रहना, बुखार, शरीर में दर्द, उल्टी।
क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस होने के लक्षण:
खांसी होना और खासते वक्त बलगम बनना, chronic brochitis emphysema के साथ होता है, जो COPD बन जाता है। इसमें रोगी को सांस लेने में कठिनाई और शारीरिक थकावट हो सकती है तथा रोगी को कृत्रिम ऑक्सीजन भी हो सकता है, इसके अलावा खांसी 3 महीने और अधिक समय के लिए रहती है।
सामान्य सर्दी और फ्लू के लिए जिम्मेदार वायरस वही है जो एक्यूट ब्रोंकाइटिस का कारण बनते हैं। लेकिन कभी-कभी यह ब्रोंचाइटिस के कारण भी हो सकता है। दोनों ही मामलों में, ब्रोन्कियल नलिया सूज जाती हैं, जिसे अधिक बलगम पैदा होता है क्योंकि शरीर कीटाणुओं से लड़ता हैं । यह वायु मार के संकुचन की ओर जाता है, जिससे सांस लेने में मुश्किल हो जाता है ।
इसके अलावा ब्रोंकाइटिस के विकास के लिए जिम्मेदार सामान्य कारणों में शामिल है:
ब्रोंकाइटिस के इलाज के लिए आयुर्वेद में त्रिक्टु चूर्ण , सितोपलादि चूर्ण , तालीसदी चूर्ण, सोमलता चूर्ण, टंकण भस्म, सफटिक भस्म, संजीवनी वटी, कनकासव, दशमूलरिष्ट जैसी प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध हैं जो ब्रोंकाइटिस का जड़ से इलाज करती है ।
यह सांस फूलने की बीमारी है । जब किसी भी व्यक्ति की सास के नलियो में खराबी या उसके फेफड़ों की नालियां पतली हो जाती हैं और उसके कारण सांस लेने में तकलीफ होती है तो यह बीमारी को दमें या अस्थमा की बीमारी कहा जाता है ।
अस्थमा के उपचार के लिए आयुर्वेद में श्वास कुठार रस, काफ्केतु रस, सितोपलादि चूर्ण , तालीसदी चूर्ण, त्रिकटु चूर्ण, सोमलता चूर्ण, टंकण भस्म, सफटिक भस्म, कनकासव, दशमूलारिष्ट, सौधवादी तेल जैसी अत्यंत प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध है ।
पुरानी खासी एक खासी है जो 3 हफ्ते से अधिक समय तक रहती है कभी-कभी वयस्को या बच्चों में पुरानी खांसी महीनों या वर्षों तक भी रह सकती है |
दमा (सहित गंभीर अस्थमा), क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस (गंभीर , दीर्घकालिक सूजन और ब्रोचि की जलन) ,गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रिफ्लक्स रोग ( जीईआरडी ) , साइनसिसिटिस ( साइनस की सूजन, सिर में खोखली गुआएं जो उस हवा को छानने और नम करने में मदद करती है जिसमें हम सांस लेते हैं ) , निमोनिया, चिरकालिक प्रतिरोध फुफ्फुसीय रोग (सीओपीडी ) , फेफड़ों में संक्रमण, फेफड़ों का कैंसर, वायु प्रदूषण, काली खासी, एसीई इनहिंबिटर ( उच्च रक्तचाप के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं ) एलर्जी , धूम्रपान ।
कफ युक्त खांसी, सांस लेने में तकलीफ, गले में खराश, छाती में दर्द, गले में घुंघरू की आवाज आना और नाक बंद होना ।
CHRONIC OBSTRUCTIVE PULMONARY DISEASE (COPD) फेफड़ों का एक ऐसा रोग है, जिसमें मरीज सामान्य रूप से सांस नहीं ले पाता। सीओपीडी रोग में मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है, गहरी सांस लेना, और समय के साथ- साथ मरीज की हालत भी बिगड़ती जाती है।
हेपेटाइटिस बी या सी वायरस का संक्रमण से यकृत को गंभीर क्षति हो सकती है जो लिवर सिरोसिस (पूर्ण स्कारिग ) से यकृत की विफलता और यहां तक कि कुछ मामलों में यकृत का कैंसर हो सकता है ।
दोनों घातक संक्रमण हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमित व्यक्ति से दूषित वक्त हस्तांतरण के माध्यम से फैलता है नशीली दवाएं शराब पीना असुरक्षित यौन संबंध समय पर टिकाना लगवाने से नेल कटर कपड़े इत्यादि को साझा करने से ।
जॉन्डिस या पीलिया , यूरिन का रंग बदलना , बहुत अधिक थकान , उल्टी या जी मिचलाना , पेट दर्द और सूजन , खुजली , भूख ना लगना या कम लगना , अचानक से वजन कम हो जाना ।
भुम्यमलकी क्वाथ , गुडुची सत्व , निंबक्वाथ
लिवर सिरोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें लीवर में धीरे-धीरे खराबी आने लगती है और लीवर सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाता है । लिवर सिरोसिस एक गंभीर लिवर समस्या है जिसमें मृत्यु की संभावना बहुत अधिक रहती है । लीवर की बीमारियों में लिवर सिरोसिस को लिवर खराब होने का अंतिम चरण माना जाता है ।
लंबे समय तक शराब का सेवन , हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण , फैटी लीवर ,दवाएं जैसे कि मैथोट्रेक्सेट( Methotrexate) का अधिक प्रयोग , अनुवांशिक पाचन संबंधी विचार , शारीर में अधिक आयरन हो जाना , लीवर में तांबे का संग्रह (विल्सन रोग ) , पित्त नलिकाओ का कमजोर होना ( बिलायरी अस्ट्रेसिया ) , शुगर मेटाबॉलिज्म के अनुवांशिक रोग ( गैलेक्टोसेमिया या ग्लाइकोजन स्टोरेज रोग ) , पित्त नलिकाए खराब होना ( प्राइमरी बिलायरी सिरोसिस )
ऊपरी पेट पर रक्त कोशिकाएं त्वचा पर दिखाई देना , हथेलियां लाल होना , भूख कम लगना , खुजलीदार त्वचा, वजन कम होना , लीवर वाली जगह पर दर्द होना या छूने पर दर्द महसूस होना , मांसपेशियों में ऐंठन , नाक से खून बहना , दाहिने कंधे में दर्द होना , सांस फूलना , मसूड़ों से खून बहना , मल का रंग तारकोल जैसा होना या अधिक पीले रंग का मल आना , पेशाब का रंग गहरा होना, उल्टी के साथ खून, बार बार बुखार होना, और संक्रमण के जोखिम बढ़ना, टांगो, पैरों, व टखनो में तरल पदार्थ बनना (यह स्थिति को एडिमा के नाम से भी जाना जाता है ) ,पीलिया या त्वचा पीली होना और आंखों व जीभ सफेद होना ।
पुनर्नवा मण्डूर , भूम्य आमलकी , ताप्यादि लौह, गौमूत्र हरीतकी , मकोय अर्क , जलोदरादि रस |
पौरुष ग्रंथि का आकार में धीरे धीरे बढ़ना जिससे पेशाब करने में समस्या हो सकती है उसे BPH (पौरुष ग्रंथि वृद्धि) कहा जाता है।
बीपीएच का वास्तविक कारण अच्छी तरह से समझा नहीं गया है। पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन भी कम होने लगता है। यह, बदले में, सिस्टम में एस्ट्रोजेन के अनुपात को बढ़ाता है। अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन के बीच इस अनुपात के कारण सौम्य प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया का परिणाम हो सकता है। प्रोस्टेट के भीतर एस्ट्रोजन का उच्च स्तर उन पदार्थों की गतिविधि को बढ़ा देता है जो प्रोस्टेट कोशिकाओं के विकास को बढ़ाते हैं।
बीपीएच का वास्तविक कारण अच्छी तरह से समझा नहीं गया है। पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन भी कम होने लगता है। यह, बदले में, सिस्टम में एस्ट्रोजेन के अनुपात को बढ़ाता है। अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरोन के बीच इस अनुपात के कारण सौम्य प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया का परिणाम हो सकता है। प्रोस्टेट के भीतर एस्ट्रोजन का उच्च स्तर उन पदार्थों की गतिविधि को बढ़ा देता है जो प्रोस्टेट कोशिकाओं के विकास को बढ़ाते हैं।
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